इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!

This is another scintillating poem by Harivansha Rai.

इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!

ज़मीन है न बोलती न आसमान बोलता,
जहान देखकर मुझे नहीं जबान खोलता,
नहीं जगह कहीं जहाँ न अजनबी गिना गया,
कहाँ-कहाँ न फिर चुका दिमाग-दिल टटोलता,
कहाँ मनुष्य है कि जो उमीद छोड़कर जिया,
इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो

इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!

तिमिर-समुद्र कर सकी न पार नेत्र की तरी,
विनष्ट स्वप्न से लदी, विषाद याद से भरी,
न कूल भूमि का मिला, न कोर भोर की मिली,
न कट सकी, न घट सकी विरह-घिरी विभावरी,
कहाँ मनुष्य है जिसे कमी खली न प्यार की,
इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे दुलार लो!

इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!

उजाड़ से लगा चुका उमीद मैं बहार की,
निदघ से उमीद की बसंत के बयार की,
मरुस्थली मरीचिका सुधामयी मुझे लगी,
अंगार से लगा चुका उमीद मै तुषार की,
कहाँ मनुष्य है जिसे न भूल शूल-सी गड़ी
इसीलिए खड़ा रहा कि भूल तुम सुधार लो!

इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!
पुकार कर दुलार लो, दुलार कर सुधार लो!

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जो बीत गई सो बात गई

Heard this poem when I was in class 10th. Then I just studied it for the sake of exams but the real essence of it hailed upon me over the years. Enjoy reading it

जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अंबर के आंगन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गये फ़िर कहां मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अंबर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई

जीवन में वह था एक कुसुम
थे उस पर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुबन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियां
मुरझाईं कितनी वल्लरियां
जो मुरझाईं फ़िर कहां खिली
पर बोलो सूखे फ़ूलों पर
कब मधुबन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई

जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आंगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठते हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गई सो बात गई

रश्मिरथी / तृतीय सर्ग / भाग 3

Another awesome poem by Ramdhaari Singh “Dinkar”. This is a description of courtroom of Kauravs where Lord Krishna went to convince them of giving some part of land to Pandavas and avoiding the war. But things go wrong and an ecstatic description of the same goes here …

मैत्री की राह बताने को,
सबको सुमार्ग पर लाने को,
दुर्योधन को समझाने को,
भीषण विध्वंस बचाने को,
भगवान् हस्तिनापुर आये,
पांडव का संदेशा लाये।

‘दो न्याय अगर तो आधा दो,
पर, इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम,
रक्खो अपनी धरती तमाम।
हम वहीं खुशी से खायेंगे,
परिजन पर असि न उठायेंग!

दुर्योधन वह भी दे ना सका,
आशिष समाज की ले न सका,
उलटे, हरि को बाँधने चला,
जो था असाध्य, साधने चला।
जन नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।

हरि ने भीषण हुंकार किया,
अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,
भगवान् कुपित होकर बोले-
‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

यह देख, गगन मुझमें लय है,
यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल,
मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें।

‘उदयाचल मेरा दीप्त भाल,
भूमंडल वक्षस्थल विशाल,
भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,
मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।
दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,
सब हैं मेरे मुख के अन्दर।

‘दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,
मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,
चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर,
नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।
शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,
शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।

‘शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,
शत कोटि विष्णु जलपति, धनेश,
शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल,
शत कोटि दण्डधर लोकपाल।
जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,
हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।

‘भूलोक, अतल, पाताल देख,
गत और अनागत काल देख,
यह देख जगत का आदि-सृजन,
यह देख, महाभारत का रण,
मृतकों से पटी हुई भू है,
पहचान, कहाँ इसमें तू है।

‘अम्बर में कुन्तल-जाल देख,
पद के नीचे पाताल देख,
मुट्ठी में तीनों काल देख,
मेरा स्वरूप विकराल देख।
सब जन्म मुझी से पाते हैं,
फिर लौट मुझी में आते हैं।

‘जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन,
साँसों में पाता जन्म पवन,
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,
हँसने लगती है सृष्टि उधर!
मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,
छा जाता चारों ओर मरण।

‘बाँधने मुझे तो आया है,
जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन,
पहले तो बाँध अनन्त गगन।
सूने को साध न सकता है,
वह मुझे बाँध कब सकता है?

‘हित-वचन नहीं तूने माना,
मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,
अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।
‘टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,
बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
फण शेषनाग का डोलेगा,
विकराल काल मुँह खोलेगा।
दुर्योधन! रण ऐसा होगा।
फिर कभी नहीं जैसा होग।

‘भाई पर भाई टूटेंगे,
विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे,
सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।
आखिर तू भूशायी होगा,
हिंसा का पर, दायी होगा।’

थी सभा सन्न, सब लोग डरे,
चुप थे या थे बेहोश पड़े।
केवल दो नर ना अघाते थे,
धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।
कर जोड़ खड़े प्रमुदित, निर्भय,
दोनों पुकारते थे ‘जय-जय’!

हे भारत के राम जगो ,मैं तुम्हे जगाने आया हू

Hi folks,

A very sensitive thing about me is that I am a bit too nationalist. I heard this awesome and mind-blowing poem sometime when India was at war with pakistan on Kargil. It was sung in the most beautiful and unique way by Aushutosh Rana. I am very poor at English thus I dont have the words to describe the kind of intensity this poem created on the stage. more than 40000 people were stunned and elevated during the entire course of this poem and though I was very young I felt it too. Was looking for this poem for a long time and luckily found it just today, so here it is at a more safer and reachable place for me.
The entire line should should be read in one go and then after a small pause the next line.
njoi

हे भारत के राम जगो ,मैं तुम्हे जगाने आया हू , सो धर्मो का धर्म एक ,बलिदान बताने आया हूं ,
सुनो हिमालय कैद हुआ है ,दुश्मन की जंजीरों में आज बता दो कितना पानी है भारत के वीरो में ,
कड़ी शत्रु की फौज द्वार पर आज तुम्हे पुकार रही , सोये सिंह जगो भारत के माता तुम्हे पुकार रही ,
रण की भेरी बज रही ,उठो घोर निंद्रा त्यागो , पहला शीश चढाने वाले ,माँ के वीर पुत्र जगो
बलिदानों के वज्र दंध पर, देश भक्त की ध्वजा जगे , और रण के कंकर पहने है ,वो राज सिंह की भुजा जगे II

अग्नि पंथ के पंथी जागो ,शीश हथेली पर धरकर , जागो रक्त ,भक्त लाल के ,जागो तन के सौदागर,
खप्पर वाली काली जागे ,जागे दुर्गा बर्बंडा , और रक्त बीज का रक्त चाटने वाली जागे चामुंडा ,
नर मुंडो की माला वाला ,जागे कपाली कैलाशी , रण की चंडी घर घर नाचे , मौत फिरे प्यासी प्यासी ,
रावन का वध स्वयं करूँगा ,कहने वाला राम जगे, और कौरव शेष न एक बचेगा ,कहने वाला श्याम जगे ,
परुशराम का परशु जगे ,रघुनन्दन का बन जगे , यदुनंदन का चक्र जगे ,अर्जुन का धनुष महान जगे ,
परुशराम का परशु जगे ,पोरुष परुस महान जगे , और सेल्यूकस को कसने वाला ,चन्द्रगुप्त बलवान जगे II

हठी हमीर जगे ,जिसने झुकना कभी न जाना , जगे पदमनी का जोहर ,जागे केशरिया बना ,
देशभक्त का जीवीत झन्डा , आजादी का दीवाना , और रक्त प्रताप का सिंह जागे ,वो हल्दी घाटी का राना
दक्खिन वाला जगे शिवाजी .,खून शाहजी का राना , मरने की हठ ठाना करते ,वीर मराठो के रजा ,
छत्र शाल बुंदेला जागे ,पंजाबी कृपान जगे, और दो दिन जिया शेर के माफिक ,वो टीपू सुलतान जगे ,
गर्वाहे का जगे मोर्चा ,जगे झाँसी की रानी , अहमदशाह जगे लखनऊ का ,जगे कुंवर सिंह बलिदानी ,
गर्वाहे का जगे मोर्चा ,पानीपत मैदान जगे , भगत सिंह की फांसी जगे ,राजगुरु के प्राण जगे II

जिसकी छोटी सी लकुटी से (बापू ),संगीने भी हार गयी हिटलर को जीता ,वे फौजे सात समुन्द्र पर गयी ,
उस लकुटि और लंगोटी वाले बापू का बलिदान जगे , ये भारत देश महान जगे ,ये भारत की संतान जगे ,
आजादी की दुल्हन को जो सबसे पहले चूम गया , स्वयं कफ़न की गाँठ बाँधकर,सातों भंवर घूम गया ,
उस सुभाष की शान जगे ,उस सुभाष की आन जगे , ये भारत देश महान जगे ,ये भारत की संतान जगे II

झोली लेकर मांग रहा हू ,कोई शीश दान दे दो , भारत का भैरव भूखा है , कोई प्राण दान दे दो ,
खड़ी म्रत्यु की दुल्हन कुवारी ,कोई ब्याह रचा लो , कोई मर्द अपने नाम की चूड़ी तो पहना दो ,
कौन वीर निज ह्र्युदयरक्त से इसकी मांग भरेगा , कौन कफ़न का पलंग बिछा कर ,उस पर शयन करेगा ,
ओ कश्मीर हड़पने वाले ,कन खोल कर सुनतें जाना , भारत के सर की कीमत तो ,सिर्फ सर है ,
कोहिनूर की कीमत चाहे पांच हज़ार दीनार है,
रण के खेतो में जब छायेगा अमर म्रय्तु का सन्नाटा , लाशो की जब रोटी होंगी ,और बारूदों का आटा ,
सन्न सन्न करतें तीर चलेंगे ,वो माझी के तन वाला , जो हमसे टकराएगा ,चूर चूर हो जायेगा ,
इस मिटटी को छूने वाला, मिटटी में मिल जायेगा ,
मैं घर घर मैं इन्कलाब की आग जलाने आया हू , हे भारत के राम जगो ,मैं तुम्हे जगाने आया हूं , हे भारत के राम जगो ,मैं तुम्हे जगाने आया हूं II

जय भारत !!! जय हिंद !!!

I will write some day

Hi friends. I am not a very enthusiastic writer and this being my very first write-up on internet please bear with the mistakes (I hail from the A2 batch @ IIIT so errors can be excused ).

Linus Torovalds once said that electronic form of communication is way better than spoken one because when writing you have to take care that the reader is not bored and you convey your thoughts as explicitly and clearly as possible. So you save your time as well as the readers. Unfortunately , as of now I am young so unconventionally I like to stand on a stage  and use my vocal skills to persuade people into my views  rather than write on a web page and let it float around. As of now  I have this mindset, but still giving myself space for future change of thoughts I have made this blog so that if in future I feel inclined towards writing I may have a place ,by my name of course, to express myself in words.

But still I think good bloggers use the blogs to spread their words to the people they cant reach to. But to their neighbours they SPEAK OUT. I feel only a good speaker can be a good blogger and blogs should be used only when you have to reach out to a big group of people , not to spread a word within your friends or batchmates.

Anyways its already 5 in the morning and I have nothing more to say … C ya some day

Avi

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